मत्त-सा नहुष चला बैठ ऋषियान में
व्याकुल से देव चले साथ में, विमान में
पिछड़े तो वाहक विशेषता से भार की,
आरोही अधीर हुआ प्रेरणा से मार की !
“दिखता है मुझे तो कठिन मार्ग कटना,
अगर ये बढ़ना है तो कहुँ मैं किसे हटना ?
बस क्या यही है बस बैट विधियाँ गढ़ो ?
अश्व से अड़ो न अरे, कुछ तो बढ़ो, कुछ तो बढ़ो, बढ़ो .’’
बार बार कन्धे फेरने को, ऋषि अटके,
आतुर हो राजा ने सरोष पैर पटके.
क्षिप्त पद हाय! एक ऋषि को जो जा लगा,
सातो ऋषियों में महा क्षोभानल आ जगा !
“भार बहें, बातें सुनें, लातें भी सहे क्या हम ?
तू ही कह क्रूर, मौन अब भी रहें क्या हम ?
पैर था या सांप यह, डस गया संग ही.
पामर पतित हो तू होकर भुंजग ही .”
राजा हततेज हुआ शाप सुनते ही काँप,
मानो डस गया हो उसे जैसे पीनासाँप!
श्वास टूटने-सी मुख-मुद्रा हुई विकला,
”हा ! यह हुआ क्या?” यही व्यग्र वाक्य निकला !
जड़-सा सचिन्त वह नीचा सर करके,
पालकी का नाल डूबते का तृण धरके .
शून्य-पट-चित्र हुआ धुलता-सा दृष्टि से.
देखा फिर उसने समक्ष शून्य दृष्टि से .
दीख पड़ा उसको न जाने क्या समीप सा
’चौंका एक साथ वह बुझता प्रदीप-सा -
“संकट तो संकट, परन्तु यह भय क्या ?
दूसरा सृजन नहीं मेरा एक लय क्या ?”
सँभला अद्मय मानी वह खींचकर ढीले अंग -
“ कुछ नहीं स्वप्न था सो हो गया भला ही भंग.
कठिन कठोर सत्य ! तो भी शिरोधार्य है,
शांत हों महर्षि, मुझे शाप अंगीकार्य है .”
दुःख में भी राजा मुसकाया पूर्व-दर्प से -
“मानते हो तुम अपने को डसा सर्प से .
होते ही परन्तु पद स्पर्श भूल-चूक से
मैं भी क्या डसा नहीं गया हुँ दन्दशूक से ?
मानता हूँ भुल हुई, खेद मुझे इसका,
सौंपे वही कार्य, उसे धार्य हो जो जिसका .
स्वर्ग से पतन, किन्तु गोत्रिणी की गोद में,
और जिस जोन में जो, सो उसी में मोद में .
काल गतिशील, मुझे लेके नहीं बेठैगा,
किन्तु उस जीवन में विष घुस पैठेगा .
तो भी खोजने का कुछ रास्ता जो उठायेगें
विष में भी अमृत छुपा वे कृती पावेंगें.
मानता हूँ, आड़ ही ली मैंने स्वाधिकार की,
मूल में जो प्रेरणा थी काम के विकार की .
माँगता हूँ आज में शची से भी खुली क्षमा ,
विधि से बहिर्गता भी साधवी वह ज्यों रमा .
मानता हूँ, भूल गया नारद का कहना -
“दैत्यों से बचाये भोगधाम रहना .
आप घुसा असुर हाय ! मेरे ही ह्रदय में,
मानता हूँ आप लज्जा पाप-अविनय में .
मानता हुँ और सब, हार नहीं मानता
अपनी अगाति नहीं आज भी मैं जानता .
आज मेरा भुक्तोङ्झित हो गया है स्वर्ग भी,
लेके दिखा दूँगा कल मैं ही अपवर्ग भी .
तन जिसका हो मन और आत्मा मेरा है,
चिन्ता नहीं बाहर उजेला या अँधेरा है .
चलना मुझे है बस अंत तक चलना ;
गिरना ही मुख्य नहीं, मुख्य है सँभलना.
गिरना क्या उसका उठा ही नहीं जो कभी ?
मैं ही तो उठा था आप, गिरता हूँ जो अभी .
फिर भी उठूँगा और बढ़के रहूँगा मैं,
नर हूँ, पुरुष हूँ मैं, चढ़ के रहूँगा मैं .
चाहे जहाँ मेरे उठाने के लिये ठौर है.
किन्तु लिया आज मैंने भार कुछ और है .
उठना मुझे ही नहीं बस एक मात्र रीते हाथ,
मेरा देवता भी और ऊंची उठे मेरे साथ .”
Nahush with corrections
मत्त-सा नहुष चला बैठ ऋषियान में
व्याकुल से देव चले साथ में, विमान में
पिछड़े तो वाहक विशेषता से भार की,
आरोही अधीर हुआ प्रेरणा से मार की !
“दिखता है मुझे तो कठिन मार्ग कटना,
अगर ये बढ़ना है तो कहुँ मैं किसे हटना ?
बस क्या यही है बस बैट विधियाँ गढ़ो ?
अश्व से अड़ो न अरे, कुछ तो बढ़ो, कुछ तो बढ़ो, बढ़ो .’’
बार बार कन्धे फेरने को, ऋषि अटके,
आतुर हो राजा ने सरोष पैर पटके.
क्षिप्त पद हाय! एक ऋषि को जो जा लगा,
सातो ऋषियों में महा क्षोभानल आ जगा !
“भार बहें, बातें सुनें, लातें भी सहे क्या हम ?
तू ही कह क्रूर, मौन अब भी रहें क्या हम ?
पैर था या सांप यह, डस गया संग ही.
पामर पतित हो तू होकर भुंजग ही .”
राजा हततेज हुआ शाप सुनते ही काँप,
मानो डस गया हो उसे जैसे पीनासाँप!
श्वास टूटने-सी मुख-मुद्रा हुई विकला,
”हा ! यह हुआ क्या?” यही व्यग्र वाक्य निकला !
जड़-सा सचिन्त वह नीचा सर करके,
पालकी का नाल डूबते का तृण धरके .
शून्य-पट-चित्र हुआ धुलता-सा दृष्टि से.
देखा फिर उसने समक्ष शून्य दृष्टि से .
दीख पड़ा उसको न जाने क्या समीप सा
’चौंका एक साथ वह बुझता प्रदीप-सा -
“संकट तो संकट, परन्तु यह भय क्या ?
दूसरा सृजन नहीं मेरा एक लय क्या ?”
सँभला अद्मय मानी वह खींचकर ढीले अंग -
“ कुछ नहीं स्वप्न था सो हो गया भला ही भंग.
कठिन कठोर सत्य ! तो भी शिरोधार्य है,
शांत हों महर्षि, मुझे शाप अंगीकार्य है .”
दुःख में भी राजा मुसकाया पूर्व-दर्प से -
“मानते हो तुम अपने को डसा सर्प से .
होते ही परन्तु पद स्पर्श भूल-चूक से
मैं भी क्या डसा नहीं गया हुँ दन्दशूक से ?
मानता हूँ भुल हुई, खेद मुझे इसका,
सौंपे वही कार्य, उसे धार्य हो जो जिसका .
स्वर्ग से पतन, किन्तु गोत्रिणी की गोद में,
और जिस जोन में जो, सो उसी में मोद में .
काल गतिशील, मुझे लेके नहीं बेठैगा,
किन्तु उस जीवन में विष घुस पैठेगा .
तो भी खोजने का कुछ रास्ता जो उठायेगें
विष में भी अमृत छुपा वे कृती पावेंगें.
मानता हूँ, आड़ ही ली मैंने स्वाधिकार की,
मूल में जो प्रेरणा थी काम के विकार की .
माँगता हूँ आज में शची से भी खुली क्षमा ,
विधि से बहिर्गता भी साधवी वह ज्यों रमा .
मानता हूँ, भूल गया नारद का कहना -
“दैत्यों से बचाये भोगधाम रहना .
आप घुसा असुर हाय ! मेरे ही ह्रदय में,
मानता हूँ आप लज्जा पाप-अविनय में .
मानता हुँ और सब, हार नहीं मानता
अपनी अगाति नहीं आज भी मैं जानता .
आज मेरा भुक्तोङ्झित हो गया है स्वर्ग भी,
लेके दिखा दूँगा कल मैं ही अपवर्ग भी .
तन जिसका हो मन और आत्मा मेरा है,
चिन्ता नहीं बाहर उजेला या अँधेरा है .
चलना मुझे है बस अंत तक चलना ;
गिरना ही मुख्य नहीं, मुख्य है सँभलना.
गिरना क्या उसका उठा ही नहीं जो कभी ?
मैं ही तो उठा था आप, गिरता हूँ जो अभी .
फिर भी उठूँगा और बढ़के रहूँगा मैं,
नर हूँ, पुरुष हूँ मैं, चढ़ के रहूँगा मैं .
चाहे जहाँ मेरे उठाने के लिये ठौर है.
किन्तु लिया आज मैंने भार कुछ और है .
उठना मुझे ही नहीं बस एक मात्र रीते हाथ,
मेरा देवता भी और ऊंची उठे मेरे साथ .”