Veer Tum Badhe Chalo

बढ़े चलो
-द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी

वीर तुम बढ़े चलो
धीर तुम बढ़े चलो

साथ में ध्वजा रहे
बाल दल सजा रहे
ध्वज कभी झुके नहीं
दल कभी रुके नहीं

सामने पहाड़ हो
सिंह की दहाड़ हो
तुम निडर,हटो नहीं
तुम निडर,डटो वहीं

वीर तुम बढ़े चलो
धीर तुम बढ़े चलो

प्रात हो कि रात हो
संग हो न साथ हो
सूर्य से बढ़े चलो
चन्द्र से बढ़े चलो

वीर तुम बढ़े चलो
धीर तुम बढ़े चलो

एक ध्वज लिये हुए
एक प्रण किये हुए
मातृ भूमि के लिये
पितृ भूमि के लिये
वीर तुम बढ़े चलो
धीर तुम बढ़े चलो

अन्न भूमि में भरा
वारि भूमि में भरा
यत्न कर निकाल लो
रत्न भर निकाल लो
वीर तुम बढ़े चलो
धीर तुम बढ़े चलो

Topic: 

Comments

तुम निडर,हटो नहीं
तुम निडर,डटो नहीं

Wasn't it like
तुम निडर,हटो नहीं
तुम निडर,डटो vaहीं

sorry did not know how to use hindi font!

I also thought so while typing it some time back, but the text said 'डटो नहीं' (my reference may be wrong though). Also 'डटो नहीं' goes well with poet's theme of 'बढ़े चलो'

It is

TUM NIDAR DATO VAHIN

Good day!

dato nahin is absolutely wrong,the line would just repeat itself.
tum nidar hato nahin
tum nidara hato nahin

toodles

its
tum nidar hato nahin
tum nidar dato VAHIN

dato nahin is absolutely wrong,the line would just repeat itself.
tum nidar hato nahin
tum nidar hato nahin

toodles

If it was 'dato nahin' it would mean don't hold your ground there

dato vahin means hold your ground there.

So 'dato nahin' is exactly the opposite of what the poet wanted to say.

Also, this poem is in CBSE curriculum, I don't remember for which grade but I am sure that it is 'dato vahin'.

dato wahin mean .... u be there and dont run off out of fear...
dato nahin mean ---- if u are so afraid of enemies u run away.

वीर तुम बढ़े चलो (Veer Tum Badhe Chalo) - द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी (Dwarika Prasad Maheshwari)
वीर तुम बढ़े चलो ! धीर तुम बढ़े चलो !

हाथ में ध्वजा रहे बाल दल सजा रहे
ध्वज कभी झुके नहीं दल कभी रुके नहीं
वीर तुम बढ़े चलो ! धीर तुम बढ़े चलो !

सामने पहाड़ हो सिंह की दहाड़ हो
तुम निडर डरो नहीं तुम निडर डटो वहीं
वीर तुम बढ़े चलो ! धीर तुम बढ़े चलो !

प्रात हो कि रात हो संग हो न साथ हो
सूर्य से बढ़े चलो चन्द्र से बढ़े चलो
वीर तुम बढ़े चलो ! धीर तुम बढ़े चलो !

एक ध्वज लिये हुए एक प्रण किये हुए
मातृ भूमि के लिये पितृ भूमि के लिये
वीर तुम बढ़े चलो ! धीर तुम बढ़े चलो !

अन्न भूमि में भरा वारि भूमि में भरा
यत्न कर निकाल लो रत्न भर निकाल लो
वीर तुम बढ़े चलो ! धीर तुम बढ़े चलो !

thats right

i was looking this poem for my test ........thanx for the poem

Wot wrote is correct: Tum nidar hato nahi, Tum nidar dato wahi.. Dato wahi means stay there firmly..

Veer tum bade chalo, dheer tum bade chalo, samne pahad ho, singh ki dahar ho, tum nidar daro nahi, tum nidar dato wohin,

I was looking 4 this poem 4 my school summer-break project. THANKs a lot.

Thanks for Such an excellent collection of hindi poems. I read most of them. and revisited my childhood days.
Thanks a lot.

hey its tum nidar hato nahi tum nidar dato vahin........iknow this coz i hav learnt this poem wen i was in 3rd grade

I learned this poem in nursery when i use to read my sibling's hindi book who I think was in Grade 3 or 4. I am 100% sure it is "tum nidar dato vahin".

ya
you are right

there was some more text

laal chaman prat ka ,mrig magan raat ka. and more can you make it complete

is kavita ka kavi kaun hai ??

-द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी

This is really a fantastic and very good poem. I was finding this from a week but I got it Today not this this type of poem..

nice compilations you have on ur blog !!! i was searching for this poem for years.........cheers

one of the best poem...

Ya, you are right but if this poem has been sang during 1857 india would had become free many years before 1947.

It can also be
tum nidar daro nahi

I was searching for this poem since last 9 years

it is

It was in 1996-97 season.. I was in clas 6th. Me n my frnds sang this poem 4 our schools annual day celebrations. Nice 2 remmbr dos sweet memories once again!!!

whenever I read this poem a great feeling of nationality rise in my heart.
This poem makes my childhood days alive

atleast post full poem or dont post only.

ye hamare aane wale naye baccho ke liye ek nayi changari deta or m zanata hu ye changari kabhi bhuj nahi paye

its nt like veer tum dato wahin....
it is marg me ruko nahin...

I always loved this poem. It was in my 3rd class Hindi book. I am going to teach this to my daughter for hindi recitation. Thanks for uploading.

टीम
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टिप्पणी

वीर तुम बढ़े चलो / द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

मुखपृष्ठ » रचनाकारों की सूची » रचनाकार: द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी » वीर तुम बढ़े चलो

वीर तुम बढ़े चलो ! धीर तुम बढ़े चलो !

हाथ में ध्वजा रहे बाल दल सजा रहे
ध्वज कभी झुके नहीं दल कभी रुके नहीं
वीर तुम बढ़े चलो ! धीर तुम बढ़े चलो !

सामने पहाड़ हो सिंह की दहाड़ हो
तुम निडर डरो नहीं तुम निडर डटो वहीं
वीर तुम बढ़े चलो ! धीर तुम बढ़े चलो !

प्रात हो कि रात हो संग हो न साथ हो
सूर्य से बढ़े चलो चन्द्र से बढ़े चलो
वीर तुम बढ़े चलो ! धीर तुम बढ़े चलो !

एक ध्वज लिये हुए एक प्रण किये हुए
मातृ भूमि के लिये पितृ भूमि के लिये
वीर तुम बढ़े चलो ! धीर तुम बढ़े चलो !

अन्न भूमि में भरा वारि भूमि में भरा
यत्न कर निकाल लो रत्न भर निकाल लो
वीर तुम बढ़े चलो ! धीर तुम बढ़े चलो !
श्रेणियाँ: कविता | प्रसिद्ध रचना

thanku so much!!!!!
humne ye kavita 2ri ya 3ri mein padhi thi.
iseki pahli 4 lines aaj bhi yaad thi kai dino se ise dhoondh rahe the... umeed nahin thi ki net par itni aasani se mil jaayegi... ye kavita humare jeevan ki pahli kavita hai aur jeevan bhar ki PRERNA!!!
dhanyawad!

SAME HERE I WAS ALSO LOOKING FOR THE SAME ACTUALLY I HAD DONE MY SCHOOLING UPTO 3RD IN UP THEN MIGRATED TO PANJAB BUT STILL IT WAS IN MY MIND I ASKED MANY PEOPLE IN UP TO PLEASE ARRANGE TO ME FOR THIS POEM BUT ALL IN VAIN .BUT THIS WORLD OF TECHNOLOGY MADE THIS POSSIBLE I FEELS IMMENSE PLEASURE TO CONGRATULATE TO THE BUDDY WHO STARTS OUT THIS GREAT VENTURE AND MAKING MY SEARCH TO AN END.

<dd><em><cite>वीर तुम बढ़े चलो ! धीर तुम बढ़े चलो !!

हाथ में ध्वजा रहे बाल दल सजा रहे, ध्वज कभी झुके नहीं दल कभी रुके नहीं!
वीर तुम बढ़े चलो ! धीर तुम बढ़े चलो !!

सामने पहाड़ हो सिंह की दहाड़ हो, तुम निडर डरो नहीं तुम निडर डटो वहीं!
वीर तुम बढ़े चलो ! धीर तुम बढ़े चलो !!

प्रात हो कि रात हो संग हो न साथ हो, सूर्य से बढ़े चलो चन्द्र से बढ़े चलो!
वीर तुम बढ़े चलो ! धीर तुम बढ़े चलो !!

एक ध्वज लिये हुए एक प्रण किये हुए, मातृ भूमि के लिये पितृ भूमि के लिये!
वीर तुम बढ़े चलो ! धीर तुम बढ़े चलो !!

अन्न भूमि में भरा वारि भूमि में भरा, यत्न कर निकाल लो रत्न भर निकाल लो!
वीर तुम बढ़े चलो ! धीर तुम बढ़े चलो !! </cite></em></dd>

<dd><dd><strong>सावर्ण </strong></dd></dd>

न हाथ एक शस्त्र हो,
न हाथ एक अस्त्र हो,
न अन्न वीर वस्त्र हो,
हटो नहीं, डरो नहीं,
बढ़े चलो, बढ़े चलो

रहे समक्ष हिम-शिखर,
तुम्हारा प्रण उठे निखर,
भले ही जाए जन बिखर,
रुको नहीं, झुको नहीं,
बढ़े चलो, बढ़े चलो

घटा घिरी अटूट हो,
अधर में कालकूट हो,
वही सुधा का घूंट हो,
जिये चलो, मरे चलो,
बढ़े चलो, बढ़े चलो

गगन उगलता आग हो,
छिड़ा मरण का राग हो,
लहू का अपने फाग हो,
अड़ो वहीं, गड़ो वहीं,
बढ़े चलो, बढ़े चलो

चलो नई मिसाल हो,
जलो नई मिसाल हो,
बढो़ नया कमाल हो,
झुको नही, रूको नही,
बढ़े चलो, बढ़े चलो

अशेष रक्त तोल दो,
स्वतंत्रता का मोल दो,
कड़ी युगों की खोल दो,
डरो नही, मरो नहीं,
बढ़े चलो, बढ़े चलो

Reminding Primery days.. perhaps learnd in UP school baord.. in 1982-83

This poem has been motivating me throughout my life and yet again it worked wonder by helping me accomplish my marathons in dying moments.

nice poem.motivational and inspiring.a must read which would deeply inspire and guide students to serve the motherland .love
it

A VERY MEANINGFUL POEM WHICH SHOULD BE ENJOYED AND UNDERSTOOD BY ALL.

It is very awesome poem that really give a great motivation & zeal to move ahead in life without any fear.I had read the same in my 2or3rd std.

Ye kavita purani yaad dila rahi hai wow kya din the wo bhartiyon.

Bahoot hi sarahniya, hum BSEB (Bihar board) ke syllabus me ye kavita tha..
Hum bachchhe jinko 15 ya 26 tarikhi 'bundiya' khane aur 'bans' katane aur chutti ka ek din lagata tha ko is kavita ne 《hamare hindi ke Master Sahab- Pandiji Mastersahab ne》mayane badal diya tha!