Itne Unche Utho

इतने ऊँचे उठो
- द्वारिका प्रसाद महेश्वरी (Dwarika Prasad Maheshwari)

(Thanks to Yogendra Singh for sending this poem)

इतने ऊँचे उठो कि जितना उठा गगन है।
देखो इस सारी दुनिया को एक दृष्टि से
सिंचित करो धरा, समता की भाव वृष्टि से
जाति भेद की, धर्म-वेश की
काले गोरे रंग-द्वेष की
ज्वालाओं से जलते जग में
इतने शीतल बहो कि जितना मलय पवन है॥

नये हाथ से, वर्तमान का रूप सँवारो
नयी तूलिका से चित्रों के रंग उभारो
नये राग को नूतन स्वर दो
भाषा को नूतन अक्षर दो
युग की नयी मूर्ति-रचना में
इतने मौलिक बनो कि जितना स्वयं सृजन है॥

लो अतीत से उतना ही जितना पोषक है
जीर्ण-शीर्ण का मोह मृत्यु का ही द्योतक है
तोड़ो बन्धन, रुके न चिंतन
गति, जीवन का सत्य चिरन्तन
धारा के शाश्वत प्रवाह में
इतने गतिमय बनो कि जितना परिवर्तन है।

चाह रहे हम इस धरती को स्वर्ग बनाना
अगर कहीं हो स्वर्ग, उसे धरती पर लाना
सूरज, चाँद, चाँदनी, तारे
सब हैं प्रतिपल साथ हमारे
दो कुरूप को रूप सलोना
इतने सुन्दर बनो कि जितना आकर्षण है॥

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Comments

GREAT POEM

superb

Hindi has its own way to Impress any heart...Great Poem.

Thanks for sending this poem Send some more patriotic poems

Hindi Desh ki Bindi.

Hindi Desh ki Bindi.

This is khoobsurat...

Beautiful! glad to find such a wonderful collection of hindi poems on net.

a great salute to this poem.

i studied in std. IX.till 2day(18yrs.) i remember it.the poem is my source of inspiration 2 move further in life.

wah beautiful

behatarin pankatiyan,sabse acchhi, itna maulik bano ki jitna maulik svayam srijan hai' aap agar meri svayam likhi kavitayein padhna chahte hain to,(chukki364.blogspot.com)par jaaye,apne comments jaroor de

अद्भुत है...गर्व है हिंदी पर..गर्व है सोच पर..गर्व है इस कवि और उनकी कविता पर

Its always refreshing and inspiring for young teens.