Ramdhari Singh Dinkar


Ramdhari Singh 'Dinkar' (रामधारी सिंह दिनकर) is one of the best hindi poets ever, famous for his 'veer ras' (heroism and positivity). He was born on 23 September 1908 and died on 24 April 1974 (aged 65).

His poetry has been used again and again by various activists and political leaders to represent feelings of indignation and action among ...

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Patriotic Poems (देशभक्ति की कविताएँ)

Patriotic poems (देशभक्ति की कविताएँ) have a unique hold on our minds and hearts as they convey our love and pride in the nation in a touching way. If projected properly, nationalism provides an immensely positive context and environment to live and operate, motivating us to do better day after day.

Below is a collection of patriotic poems in hindi (देशभक्ति की हिंदी कविताएँ):

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Teer Pe Kaise Ruku Mein, Aaj Leharo mein Nimantaran

तीर पर कैसे रुकूँ मैं आज लहरों में निमंत्रण
- हरिवंश राय बच्चन (Harivansh Rai Bachchan)

तीर पर कैसे रुकूँ मैं आज लहरों में निमंत्रण

आज सपनों को मैं सच बनाना चाहता हूं
दूर किसी कल्पना के पास जाना चाहता हूं।

रात का अंतिम प्रहर है, झिलमिलाते हैं सितारे,
वक्ष पर युग बाहु बाँधे मैं खड़ा सागर किनारे
वेग से बहता प्रभंजन केश-पट मेरे उड़ाता,
शून्य में भरता उदधि, उर की रहस्यमयी पुकारें,

इन पुकारों की प्रतिध्वनि हो रही मेरे हृदय में,
है प्रतिच्छायित जहाँ पर सिंधु का हिल्लोल - कंपन!

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Gandhi

गाँधी
- रामधारी सिंह दिनकर (Ramdhari Singh Dinkar)

देश में जिधर भी जाता हूँ,
उधर ही एक आह्वान सुनता हूँ
“जड़ता को तोड़ने के लिए
भूकम्प लाओ ।
घुप्प अँधेरे में फिर
अपनी मशाल जलाओ ।
पूरे पहाड़ हथेली पर उठाकर
पवनकुमार के समान तरजो ।
कोई तूफ़ान उठाने को
कवि, गरजो, गरजो, गरजो !”

सोचता हूँ, मैं कब गरजा था ?
जिसे लोग मेरा गर्जन समझते हैं,
वह असल में गाँधी का था,
उस गाँधी ...

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Aaj Paheli Baar

आज पहली बार (Aaj Paheli Baar)
- सर्वेश्वरदयाल सक्सेना (Sarveshwar Dayal Saxena)

आज पहली बार
थकी शीतल हवा ने
शीश मेरा उठा कर
चुपचाप अपनी गोद में रक्खा
और जलते हुए मस्तक पर
काँपता सा हाथ रख कर कहा
"सुनो, मैं भी पराजित हूँ
सुनो, मैं भी बहुत भटकी हूँ
सुनो, मेरा भी नहीं कोई
सुनो, मैं भी कहीं अटकी हूँ
पर न जाने क्यों
पराजय नें मुझे शीतल किया
और हर भटकाव ने गति दी
नहीं कोई था
इसी से सब हो गए मेरे
मैं ...

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Manjil Door Nahi Hai

मंजिल दूर नहीं है (Manjil Door Nahi Hai)
- रामधारी सिंह दिनकर (Ramdhari Singh Dinkar)

वह प्रदीप जो दीख रहा है झिलमिल, दूर नहीं है
थककर बैठ गये क्या भाई! मंजिल दूर नहीं है।

चिनगारी बन गई लहू की
बूँद गिरी जो पग से
चमक रहे, पीछे मुड़ देखो,
चरण - चिह्न जगमग - से।
शुरू हुई आराध्य-भूमि यह,
क्लान्ति नहीं रे राही
और नहीं तो पाँव लगे हैं,
क्यों पड़ने डगमग - से?
बाकी होश तभी तक, जब तक जलता तूर नहीं है;
थककर बैठ गये क्या भाई! मंजिल दूर नहीं है।

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Human - An Independence Day Short Film

A beautiful clip portraying the bond of humanity. Two strangers, one Hindu one Muslim, shun their prejudices over the course of conversation and share warm laughs with ammi-ka-khana.

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I Am That Change

This video shows beautifully how we can "be the change" in our everyday life. Performing our duties is also Patriotism. Change begins with us.

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Roobaroo - Unity of Diversity

Different languages, one emotion, uniting all. 10 artists come together to re-create Roobaroo in a musical union of diverse languages. This proves yet again that music is beyond languages.

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Tu Kitni Achhi Hai

A moving song on mothers. It will make you hug tight your mother.

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