Khada Himalaya Bata Raha Hai

खड़ा हिमालय बता रहा है
- सोहनलाल द्विवेदी (Sohanlal Dwivedi)

युग युग से है अपने पथ पर
देखो कैसा खड़ा हिमालय!
डिगता कभी न अपने प्रण से
रहता प्रण पर अड़ा हिमालय!

जो जो भी बाधायें आईं
उन सब से ही लड़ा हिमालय,
इसीलिए तो दुनिया भर में
हुआ सभी से बड़ा हिमालय!

अगर न करता काम कभी कुछ
रहता हरदम पड़ा हिमालय,
तो भारत के शीश चमकता
नहीं मुकुट–सा जड़ा हिमालय!

खड़ा हिमालय बता रहा है
डरो न आँधी पानी में,
खड़े रहो अपने पथ पर
सब कठिनाई तूफानी में!

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Ashfaq Ki Aakhri Raat

अशफाक की आखिरी रात
- अग्निवेश शुक्ल

जाऊँगा खाली हाथ मगर,यह दर्द साथ ही जायेगा;
जाने किस दिन हिन्दोस्तान,आजाद वतन कहलायेगा।
बिस्मिल हिन्दू हैं कहते हैं, फिर आऊँगा-फिर आऊँगा;
ले नया जन्म ऐ भारत माँ! तुझको आजाद कराऊँगा।।

जी करता है मैं भी कह दूँ, पर मजहब से बँध जाता हूँ;
मैं मुसलमान हूँ पुनर्जन्म की बात नहीं कह पाता हूँ।
हाँ, खुदा अगर मिल गया कहीं, अपनी झोली फैला दूँगा;
औ' जन्नत के बदले उससे, यक नया जन्म ही माँगूँगा।।

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Sinhasan Khali Karo Ki Janta Aati Hai

सिंहासन खाली करो कि जनता आती है
- रामधारी सिंह दिनकर (Ramdhari Singh Dinkar)

सदियों की ठंढी, बुझी राख सुगबुगा उठी,
मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है
दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।

जनता? हां,मिट्टी की अबोध मूरतें वही,
जाड़े-पाले की कसक सदा सहनेवाली,
जब अंग-अंग में लगे सांप हो चूस रहे
तब भी न कभी मुंह खोल दर्द कहनेवाली।

जनता? हां, लंबी-बडी जीभ की वही कसम,
"जनता,सचमुच ही, बडी वेदना सहती है।"
"सो ठीक, मगर, आखिर इस पर जनमत क्या है?"
'है प्रश्न गूढ़ जनता इस पर क्या कहती है?"

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Kya Likhte Rehte Ho Yun Hi

क्या लिखते रहते हो यूँ ही
- रमेश शर्मा (Ramesh Sharma)

क्या लिखते रहते हो यूँ ही

चांद की बातें करते हो, धरती पर अपना घर ही नहीं
रोज बनाते ताजमहल, संगमरमर क्या कंकर ही नहीं
सूखी नदिया, नाव लिए तुम बहते हो यूँ ही
क्या लिखते रहते हो यूँ ही

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Maine Aahuti bankar Dekha

मैंने आहुति बन कर देखा
- अज्ञेय (Sachchidananda Hirananda Vatsyayana 'Agyeya')

मैं कब कहता हूँ जग मेरी दुर्धर गति के अनुकूल बने,
मैं कब कहता हूँ जीवन-मरू नंदन-कानन का फूल बने?
काँटा कठोर है, तीखा है, उसमें उसकी मर्यादा है,
मैं कब कहता हूँ वह घटकर प्रांतर का ओछा फूल बने?

मैं कब कहता हूँ मुझे युद्ध में कहीं न तीखी चोट मिले?
मैं कब कहता हूँ प्यार करूँ तो मुझे प्राप्ति की ओट मिले?
मैं कब कहता हूँ विजय करूँ मेरा ऊँचा प्रासाद बने?
या पात्र जगत की श्रद्धा की मेरी धुंधली-सी याद बने?

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Inklab ke Geet Sunane Wala Hoon

कलमकार हूँ इन्कलाब के गीत सुनाने वाला हूँ
- हरिओम पंवार (Hari Om Panwar)

बहुत दिनों के बाद छिड़ी है वीणा की झंकार अभय
बहुत दिनों के बाद समय ने गाया मेघ मल्हार अभय
बहुत दिनों के बाद किया है शब्दों ने श्रृंगार अभय
बहुत दिनों के बाद लगा है वाणी का दरबार अभय
बहुत दिनों के बाद उठी है प्राणों में हूंकार अभय
बहुत दिनों के बाद मिली है अधरों को ललकार अभय

मैं यथार्थ का शिला लेख हूँ भोजपत्र वरदानों का
चिंतन में दर्पण हूँ भारत के घायल अरमानों का

इसी लिए मैं शंखनाद कर अलख जगाने वाला हूँ
अग्निवंश के चारण कुल की भाषा गाने वाला हूँ
कलमकार हूँ इन्कलाब के गीत सुनाने वाला हूँ
कलमकार हूँ कलमकार का धर्म निभाने वाला हूँ

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Mukti ki Aakansha

मुक्ति की आकांक्षा
- सर्वेश्वरदयाल सक्सेना (Sarveshwar Dayal Saxena)

चिड़िया को लाख समझाओ
कि पिंजड़े के बाहर
धरती बहुत बड़ी है, निर्मम है,
वहॉं हवा में उन्‍हें
अपने जिस्‍म की गंध तक नहीं मिलेगी।

यूँ तो बाहर समुद्र है, नदी है, झरना है,
पर पानी के लिए भटकना है,
यहॉं कटोरी में भरा जल गटकना है।

बाहर दाने का टोटा है,
यहॉं चुग्‍गा मोटा है।
बाहर बहेलिए का डर है,
यहॉं निर्द्वंद्व कंठ-स्‍वर है।

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Swaraj by Arvind Kejriwal

Swaraj by Arvind Kejriwal (स्वराज - अरविन्द केजरीवाल) is a well written and thought provoking book on how we can take India forward. Please find below links for e-book version of this book in Hindi and English. A must read.

Tum Chalo to Hindustan Chale

तुम चलो तो हिंदुस्तान चले
- गुलज़ार (Gulzar)

In support of Anna Ji and Team. Let's all join Anna Hazare Ji and India against corruption in their fight for a better india!
(Thanks to Ourchitr for referencing this poem)

फलक पकड़ के उठो और हवा पकड़ के चलो
तुम चलो तो हिंदुस्तान चले

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Khooni Hastakshar

खूनी हस्‍ताक्षर
- गोपालप्रसाद व्यास (Gopalprasad Vyas)

वह खून कहो किस मतलब का
जिसमें उबाल का नाम नहीं।
वह खून कहो किस मतलब का
आ सके देश के काम नहीं ।

वह खून कहो किस मतलब का
जिसमें जीवन, न रवानी है ।
जो परवश होकर बहता है,
वह खून नहीं, पानी है ।

उस दिन लोगों ने सही-सही
खून की कीमत पहचानी थी ।
जिस दिन सुभाष ने बर्मा में
मॉंगी उनसे कुरबानी थी ।

बोले, "स्वतंत्रता की खातिर
बलिदान तुम्हें करना होगा ।
तुम बहुत जी चुके जग में,
लेकिन आगे मरना होगा ।

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