Darbar - e - watan Mein Jab Ik Din

दरबारे वतन में जब इक दिन
- फैज़ अहमद फैज़ (Faiz Ahmed Faiz)

दरबारे वतन में जब इक दिन सब जाने वाले जायेंगे
कुछ अपनी सजा को पहुंचेंगे, कुछ अपनी जजा ले जायेंगे

ऐ खाकनशीनों उठ बैठो, वो वक़्त करीब आ पहुंचा है
जब तख़्त गिराए जायेंगे, जब ताज उछाले जायेंगे

Samar Shesh Hai

समर शेष है
- रामधारी सिंह दिनकर (Ramdhari Singh Dinkar)

ढीली करो धनुष की डोरी, तरकस का कस खोलो
किसने कहा, युद्ध की बेला गई, शान्ति से बोलो?
किसने कहा, और मत बेधो हृदय वह्नि के शर से
भरो भुवन का अंग कुंकुम से, कुसुम से, केसर से?

Vashuda Ka Neta Kaun Hua? (An excerpt from Rashmirathi)

वसुधा का नेता कौन हुआ? (रश्मिरथी)
- रामधारी सिंह दिनकर (Ramdhari Singh Dinkar)

सच है, विपत्ति जब आती है,
कायर को ही दहलाती है,
शूरमा नहीं विचलित होते,
क्षण एक नहीं धीरज खोते,
विघ्नों को गले लगाते हैं,
काँटों में राह बनाते हैं।

Meri Thakan Utar Jaati Hai

मेरी थकन उतर जाती है
- रामावतार त्यागी (Ram Avtar Tyagi)

हारे थके मुसाफिर के चरणों को धोकर पी लेने से
मैंने अक्सर यह देखा है मेरी थकन उतर जाती है ।

कोई ठोकर लगी अचानक
जब-जब चला सावधानी से
पर बेहोशी में मंजिल तक
जा पहुँचा हूँ आसानी से

Insaf ki Dagar Pe

इन्साफ़ की डगर पे
- कवि प्रदीप (Kavi Pradeep)

इन्साफ़ की डगर पे, बच्चों दिखाओ चल के
ये देश है तुम्हारा, नेता तुम्हीं हो कल के

दुनिया के रंज सहना और कुछ न मुँह से कहना
सच्चाइयों के बल पे आगे को बढ़ते रहना
रख दोगे एक दिन तुम संसार को बदल के

Jo Jeevan Ki Dhool Chaat Kar Bada Hua Hai

जो जीवन की धूल चाट कर बड़ा हुआ है
- केदारनाथ अग्रवाल (Kedarnath Agarwal)

जो जीवन की धूल चाट कर बड़ा हुआ है
तूफ़ानों से लड़ा और फिर खड़ा हुआ है
जिसने सोने को खोदा लोहा मोड़ा है
जो रवि के रथ का घोड़ा है
वह जन मारे नहीं मरेगा
नहीं मरेगा

Chalna Hamara Kaam Hai

चलना हमारा काम है
- शिवमंगल सिंह 'सुमन' (ShivMangal Singh Suman)

(Thanks to Yogendra Singh ji for sending this poem)

गति प्रबल पैरों में भरी
फिर क्यों रहूं दर दर खडा
जब आज मेरे सामने
है रास्ता इतना पडा
जब तक न मंजिल पा सकूँ,
तब तक मुझे न विराम है,

Aag Jalni Chahiye

आग जलनी चाहिए
- दुष्यन्त कुमार (Dushyant Kumar)

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में

Yeh Diya Bhujhe Nahi

यह दिया बुझे नहीं
- गोपाल सिंह नेपाली (Gopal Singh Nepali)

यह दिया बुझे नहीं

घोर अंधकार हो
चल रही बयार हो
आज द्वार–द्वार पर यह दिया बुझे नहीं
यह निशीथ का दिया ला रहा विहान है।

शक्ति का दिया हुआ
शक्ति को दिया हुआ
भक्ति से दिया हुआ

Itne Unche Utho

इतने ऊँचे उठो
- द्वारिका प्रसाद महेश्वरी (Dwarika Prasad Maheshwari)

(Thanks to Yogendra Singh for sending this poem)

इतने ऊँचे उठो कि जितना उठा गगन है।
देखो इस सारी दुनिया को एक दृष्टि से
सिंचित करो धरा, समता की भाव वृष्टि से
जाति भेद की, धर्म-वेश की
काले गोरे रंग-द्वेष की

Syndicate content