Rani Padmini Gora Badal Poem by Narendra Mishr

पद्मिनी गोरा बादल
- नरेंद्र मिश्र (Narendra Mishr)

Padmini Gora Badal is an amazing poem in hindi by Narendra Mishr. It describes the bravery of Rajput warriors Gora and Badal who rescue Chittor Kind Ratan Singh who has been captured by Alauddin Khilji.

...read more

Hindi Poems for Kids - Bal Kavita

Kids of all ages love poems due to their rhythmic nature and more so if it is in their mother tongue. Hindi has a rich tradition of beautiful kid poems (poems for children or bal kavitas). It is common to find even small kids reciting hindi poem (bal kavita) very enthusiastically.

Here is a collection of popular and famous hindi poems for kids and children.

  • [बढ़े चलो (Badhe Chalo)](/poems/...

...read more

Desh Kagaz Par Bana Naksha Nahi Hota - Sarveshwar Dayal Saxena

देश कागज पर बना नक्शा नहीं होता
- सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

यदि तुम्हारे घर के
एक कमरे में आग लगी हो
तो क्या तुम
दूसरे कमरे में सो सकते हो?
यदि तुम्हारे घर के एक कमरे में
लाशें सड़ रहीं हों
तो क्या तुम
दूसरे कमरे में प्रार्थना कर सकते हो?
यदि हाँ
तो मुझे तुम से
कुछ नहीं कहना है।

देश कागज पर बना
नक्शा नहीं होता
कि एक हिस्से के फट जाने पर
बाकी हिस्से उसी तरह साबुत बने रहें
और नदियां, पर्वत, शहर, गांव...

...read more

Surya Dhaltha Hi Nahi Hai - Ramdarsh Mishra

सूर्य ढलता ही नहीं है
- रामदरश मिश्र

चाहता हूँ, कुछ लिखूँ, पर कुछ निकलता ही नहीं है
दोस्त, भीतर आपके कोई विकलता ही नहीं है!

आप बैठे हैं अंधेरे में लदे टूटे पलों से
बंद अपने में अकेले, दूर सारी हलचलों से
हैं जलाए जा रहे बिन तेल का दीपक निरन्तर
चिड़चिड़ाकर कह रहे- 'कम्बख़्त,जलता ही नहीं है!'

बदलियाँ घिरतीं, हवाएँ काँपती, रोता अंधेरा
लोग गिरते, टूटते हैं, खोजते फिरते बसेरा
किन्तु रह-रहकर सफ़र में...

...read more

Agnipath (Agneepath) - Harivansh Rai Bachchan

अग्निपथ
- हरिवंश राय बच्चन

वृक्ष हों भले खड़े
हों घने, हों बड़े
एक पत्र छाँह भी
मांग मत! मांग मत! मांग मत!
अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ!

तू न थकेगा कभी
तू न थमेगा कभी
तू न मुड़ेगा कभी
कर शपथ! कर शपथ! कर शपथ!
अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ!

यह महान दृश्य है
चल रहा मनुष्य है
अश्रु-स्वेद-रक्त से
लथ-पथ! लथ-पथ! लथ-पथ!
अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ!

lyrics of Agnipath (Agneepath)

Vriksh hon bhale khade,
hon ...

...read more

Teer Pe Kaise Ruku Mein, Aaj Leharo mein Nimantaran

तीर पर कैसे रुकूँ मैं आज लहरों में निमंत्रण
- हरिवंश राय बच्चन (Harivansh Rai Bachchan)

तीर पर कैसे रुकूँ मैं आज लहरों में निमंत्रण

आज सपनों को मैं सच बनाना चाहता हूं
दूर किसी कल्पना के पास जाना चाहता हूं।

रात का अंतिम प्रहर है, झिलमिलाते हैं सितारे,
वक्ष पर युग बाहु बाँधे मैं खड़ा सागर किनारे
वेग से बहता प्रभंजन केश-पट मेरे उड़ाता,
शून्य में भरता उदधि, उर की रहस्यमयी पुकारें,

इन पुकारों की प्रतिध्वनि हो रही मेरे हृदय में,
है प्रतिच्छायित जहाँ पर सिंधु का हिल्लोल - कंपन!

...read more

Gandhi

गाँधी
- रामधारी सिंह दिनकर (Ramdhari Singh Dinkar)

देश में जिधर भी जाता हूँ,
उधर ही एक आह्वान सुनता हूँ
“जड़ता को तोड़ने के लिए
भूकम्प लाओ ।
घुप्प अँधेरे में फिर
अपनी मशाल जलाओ ।
पूरे पहाड़ हथेली पर उठाकर
पवनकुमार के समान तरजो ।
कोई तूफ़ान उठाने को
कवि, गरजो, गरजो, गरजो !”

सोचता हूँ, मैं कब गरजा था ?
जिसे लोग मेरा गर्जन समझते हैं,
वह असल में गाँधी का था,
उस गाँधी ...

...read more

Aaj Paheli Baar

आज पहली बार (Aaj Paheli Baar)
- सर्वेश्वरदयाल सक्सेना (Sarveshwar Dayal Saxena)

आज पहली बार
थकी शीतल हवा ने
शीश मेरा उठा कर
चुपचाप अपनी गोद में रक्खा
और जलते हुए मस्तक पर
काँपता सा हाथ रख कर कहा
"सुनो, मैं भी पराजित हूँ
सुनो, मैं भी बहुत भटकी हूँ
सुनो, मेरा भी नहीं कोई
सुनो, मैं भी कहीं अटकी हूँ
पर न जाने क्यों
पराजय नें मुझे शीतल किया
और हर भटकाव ने गति दी
नहीं कोई था
इसी से सब हो गए मेरे
मैं ...

...read more

Manjil Door Nahi Hai

मंजिल दूर नहीं है (Manjil Door Nahi Hai)
- रामधारी सिंह दिनकर (Ramdhari Singh Dinkar)

वह प्रदीप जो दीख रहा है झिलमिल, दूर नहीं है
थककर बैठ गये क्या भाई! मंजिल दूर नहीं है।

चिनगारी बन गई लहू की
बूँद गिरी जो पग से
चमक रहे, पीछे मुड़ देखो,
चरण - चिह्न जगमग - से।
शुरू हुई आराध्य-भूमि यह,
क्लान्ति नहीं रे राही
और नहीं तो पाँव लगे हैं,
क्यों पड़ने डगमग - से?
बाकी होश तभी तक, जब तक जलता तूर नहीं है;
थककर बैठ गये क्या भाई! मंजिल दूर नहीं है।

...read more

Khada Himalaya Bata Raha Hai

खड़ा हिमालय बता रहा है
- सोहनलाल द्विवेदी (Sohanlal Dwivedi)

युग युग से है अपने पथ पर
देखो कैसा खड़ा हिमालय!
डिगता कभी न अपने प्रण से
रहता प्रण पर अड़ा हिमालय!

जो जो भी बाधायें आईं
उन सब से ही लड़ा हिमालय,
इसीलिए तो दुनिया भर में
हुआ सभी से बड़ा हिमालय!

...read more