Need Ka Nirmaan Phir Phir by Harivansh Rai Bachchan

नीड़ का निर्माण फिर-फिर
- हरिवंश राय बच्चन (Harivansh Rai Bachchan)

नीड़ का निर्माण फिर-फिर,
नेह का आह्वान फिर-फिर!
वह उठी आँधी कि नभ में
छा गया सहसा अँधेरा,
धूलि धूसर बादलों ने
भूमि को इस भाँति घेरा,
रात-सा दिन हो गया,
फिर रात आई और काली,
लग रहा था अब न होगा
इस निशा का फिर सवेरा,
रात के उत्पात-भय से
भीत जन-जन, भीत कण-कण
किंतु प्राची से उषा की
मोहिनी मुस्कान फिर-फिर!

नीड़ का निर्माण फिर-फिर,
...

...read more

Avhaan

आव्हान
- अशफ़ाक उल्ला खाँ (Ashfaqulla Khan)

कस ली है कमर अब तो, कुछ करके दिखाएँगे,
आज़ाद ही हो लेंगे, या सर ही कटा देंगे।

हटने के नहीं पीछे, डर कर कभी जुल्मों से,
तुम हाथ उठाओगे, हम पैर बढ़ा देंगे।

बेशस्त्र नहीं है हम, बल है हमें चरखे का,
चरखे से जमीं को हम, ता चर्ख गुँजा देंगे।
परवा नहीं कुछ दम की, गम की नहीं, मातम
की, है जान हथेली पर, एक दम में गवाँ देंगे।

उफ़ तक भी जुबां से हम हरगिज न निक...

...read more

Wo kaagaz ki kashti wo baarish ka paani

वो कागज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी
- Hindi Poem by सुदर्शन फ़ाक़िर

ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो
भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी
मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन
वो कागज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी

मुहल्ले की सबसे निशानी पुरानी
वो बुढ़िया जिसे बच्चे कहते थे नानी
वो नानी की बातों में परियों का डेरा
वो चेहरे की झुरिर्यों में सदियों का फेरा
भुलाए नहीं भूल सकता है कोई
वो छोटी सी रातें वो लम्बी कहानी

...

...read more

Kahan to tay tha chiragan harek ghar ke liye - Dushyant Kumar

कहाँ तो तय था चरागाँ हर एक घर के लिए
- Hindi poem by Dushyant Kumar (दुष्यंत कुमार)

कहाँ तो तय था चरागाँ हर एक घर के लिए
कहाँ चराग मयस्सर नहीं शहर के लिए

यहाँ दरख्तों के साए में धूप लगती है
चलो यहाँ से चले और उम्र भर के लिए

न हो कमीज तो घुटनों से पेट ढक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफर के लिए

खुदा नहीं न सही आदमी का ख्वाब सही
कोई हसीन नजारा तो है नजर के लिए

वो मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल ...

...read more

Hum Deewano Ki Kya Hasti - Hindi Poem by Bhagwati Charan Verma

हम दीवानों की क्या हस्ती
-Hindi Poem by Bhagwati Charan Verma (भगवतीचरण वर्मा)

हम दीवानों की क्या हस्ती, आज यहाँ कल वहाँ चले
मस्ती का आलम साथ चला, हम धूल उड़ाते जहाँ चले

आए बनकर उल्लास कभी, आँसू बनकर बह चले अभी
सब कहते ही रह गए, अरे तुम कैसे आए, कहाँ चले

किस ओर चले? मत ये पूछो, बस चलना है इसलिए चले
जग से उसका कुछ लिए चले, जग को अपना कुछ दिए चले

दो बात कहीं, दो बात सुनी, कुछ हँसे और फिर कुछ र...

...read more

Hindi Poems of Swami Vivekananda (स्वामी विवेकानंद)

Here are a set of hindi poems by Swami Vivekananda (स्वामी विवेकानंद).

Ma Kali (काली माँ)- Hindi Poem by Swami Vivekananda

छिप गये तारे गगन के,
बादलों पर चढ़े बादल,
काँपकर गहरा अंधेरा,
गरजते तूफान में, शत

लक्ष पागल प्राण छूटे
जल्द कारागार से–द्रुम
जड़ समेत उखाड़कर, हर
बला पथ की साफ़ करके ।

शोर से आ मिला सागर,
शिखर लहरों के पलटते
उठ रहे हैं कृष्ण नभ का
स्पर्श करने के लिए द्रुत,

किरण जैसे ...

...read more

Rabindranath Tagore Poems in Hindi (रवीन्द्रनाथ टैगोर कविताएँ)

रवीन्द्रनाथ टैगोर (Rabindranath Tagore) is one of the India's most loved poet. He became the first Indian to Nobel Prize in Literature in 1913. Tagore has a unique distiction of writing national anthems of two countries - India's Jana Gana Mana and Bangladesh's Amar Shonar Bangla. Here we present a collection of his hindi poems. We will go on adding more to this collection of tagore poems in ...

...read more

Holi Poem by Harivansh Rai Bachchan

होली (Holi)
- हरिवंश राय बच्चन (Harivansh Rai Bachchan)

यह मिट्टी की चतुराई है,
रूप अलग औ’ रंग अलग,
भाव, विचार, तरंग अलग हैं,
ढाल अलग है ढंग अलग,

आजादी है जिसको चाहो आज उसे वर लो।
होली है तो आज अपरिचित से परिचय कर को!

निकट हुए तो बनो निकटतर
और निकटतम भी जाओ,
रूढ़ि-रीति के और नीति के
शासन से मत घबराओ,

आज नहीं बरजेगा कोई, मनचाही कर लो।
होली है तो आज ...

...read more

Mein Hu Unke Saath Khadi Jo Seedhi Rakhte Apni Reedh

मैं हूँ उनके साथ खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़
- हरिवंश राय बच्चन (Harivansh Rai Bachchan)

कभी नही जो तज सकते हैं, अपना न्यायोचित अधिकार
कभी नही जो सह सकते हैं, शीश नवाकर अत्याचार
एक अकेले हों, या उनके साथ खड़ी हो भारी भीड़
मैं हूँ उनके साथ, खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़

निर्भय होकर घोषित करते, जो अपने उदगार विचार
जिनकी जिह्वा पर होता है, उनके अंतर का अंगार...

...read more

Veeron Ka Kaisa Ho Basant - Hindi Poem by Subhadra Kumari Chauhan

वीरों का कैसा हो बसंत
- सुभद्रा कुमारी चौहान (Subhadra Kumari Chauhan)

आ रही हिमालय से पुकार
है उदधि गजरता बार-बार
प्राची पश्चिम भू नभ अपार
सब पूछ रहे हैं दिग-दिगंत-
वीरों का कैसा हो बसंत

फूली सरसों ने दिया रंग
मधु लेकर आ पहुँचा अनंग
वधु वसुधा पुलकित अंग-अंग
है वीर देश में किंतुं कंत-
वीरों का कैसा हो वसंत

भर रही कोकिला इधर तान
मारू बाजे पर उधर...

...read more