Insaf ki Dagar Pe

इन्साफ़ की डगर पे
- कवि प्रदीप (Kavi Pradeep)

इन्साफ़ की डगर पे, बच्चों दिखाओ चल के
ये देश है तुम्हारा, नेता तुम्हीं हो कल के

दुनिया के रंज सहना और कुछ न मुँह से कहना
सच्चाइयों के बल पे आगे को बढ़ते रहना
रख दोगे एक दिन तुम संसार को बदल के
इन्साफ़ की डगर पे, बच्चों दिखाओ चल के
ये देश है तुम्हारा, नेता तुम्हीं हो कल के

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Jo Jeevan Ki Dhool Chaat Kar Bada Hua Hai

जो जीवन की धूल चाट कर बड़ा हुआ है
- केदारनाथ अग्रवाल (Kedarnath Agarwal)

जो जीवन की धूल चाट कर बड़ा हुआ है
तूफ़ानों से लड़ा और फिर खड़ा हुआ है
जिसने सोने को खोदा लोहा मोड़ा है
जो रवि के रथ का घोड़ा है
वह जन मारे नहीं मरेगा
नहीं मरेगा

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Chalna Hamara Kaam Hai

चलना हमारा काम है
- शिवमंगल सिंह 'सुमन' (ShivMangal Singh Suman)

(Thanks to Yogendra Singh ji for sending this poem)

गति प्रबल पैरों में भरी
फिर क्यों रहूं दर दर खडा
जब आज मेरे सामने
है रास्ता इतना पडा
जब तक न मंजिल पा सकूँ,
तब तक मुझे न विराम है,
चलना हमारा काम है ।

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Aag Jalni Chahiye

आग जलनी चाहिए
- दुष्यन्त कुमार (Dushyant Kumar)

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए

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Yeh Diya Bhujhe Nahi

यह दिया बुझे नहीं
- गोपाल सिंह नेपाली (Gopal Singh Nepali)

यह दिया बुझे नहीं

घोर अंधकार हो
चल रही बयार हो
आज द्वार–द्वार पर यह दिया बुझे नहीं
यह निशीथ का दिया ला रहा विहान है।

शक्ति का दिया हुआ
शक्ति को दिया हुआ
भक्ति से दिया हुआ
यह स्वतंत्रता–दिया

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Itne Unche Utho

इतने ऊँचे उठो
- द्वारिका प्रसाद महेश्वरी (Dwarika Prasad Maheshwari)

(Thanks to Yogendra Singh for sending this poem)

इतने ऊँचे उठो कि जितना उठा गगन है।
देखो इस सारी दुनिया को एक दृष्टि से
सिंचित करो धरा, समता की भाव वृष्टि से
जाति भेद की, धर्म-वेश की
काले गोरे रंग-द्वेष की
ज्वालाओं से जलते जग में
इतने शीतल बहो कि जितना मलय पवन है॥

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MaapDand Badlo

मापदण्ड बदलो
- दुष्यन्त कुमार (Dushyant Kumar)

(Thanks to Isht Vibhu for sending this poem)

मेरी प्रगति या अगति का
यह मापदण्ड बदलो तुम,
जुए के पत्ते सा
मैं अभी अनिश्चित हूँ ।
मुझ पर हर ओर से चोटें पड़ रही हैं,
कोपलें उग रही हैं,
पत्तियाँ झड़ रही हैं,
मैं नया बनने के लिए खराद पर चढ़ रहा हूँ,
लड़ता हुआ
नयी राह गढ़ता हुआ आगे बढ़ रहा हूँ ।

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Suraj Ka Gola

सूरज का गोला
- भवानीप्रसाद मिश्र (Bhawani Prasad Mishra)

सूरज का गोला
इसके पहले ही कि निकलता
चुपके से बोला, हमसे - तुमसे, इससे - उससे
कितनी चीजों से
चिडियों से पत्तों से
फूलो - फल से, बीजों से-
"मेरे साथ - साथ सब निकलो
घने अंधेरे से
कब जागोगे, अगर न जागे, मेरे टेरे से ?"

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Mashal

In tribute to people who have lost their lives in Mumbai Attacks - an old poem by Mahendra Bhatnagar.

मशाल
- महेन्द्र भटनागर (Mahendra Bhatnagar)

बिखर गये हैं जिन्दगी के तार-तार
रुद्ध-द्वार, बद्ध हैं चरण
खुल नहीं रहे नयन
क्योंकि कर रहा है व्यंग्य
बार-बार देखकर गगन !

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Saare Jahan Se Achcha

सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्तां हमारा
- मुहम्मद इक़बाल (Muhammad Iqbal)

On the eve of Independence day, here goes the complete 'saare jahan se achha' song by Iqbal. This song is very popular in India - though typically only a subset of the song is sung (with 1st, 3rd, 4th, and 6th stanza).

सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्तां हमारा
हम बुलबुलें हैं इसकी, यह गुलिसतां हमारा

गुरबत में हों अगर हम, रहता है दिल वतन में
समझो वहीं हमें भी, दिल हो जहाँ हमारा

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